डॉ. विजय मित्तल द्वारा रचित ग़ज़ल व्याकरण पर यह पुस्तक ग़ज़ल विधा को बेहद आसान व वैज्ञानिक प्रणाली द्वारा आम आदमी तक पहुंचाने की एक सफल कोशिश है। यह प्रणाली पिंगल शास्त्र व खलीली उरूज़ से हटकर है जिसे अपनाकर कोई भी शायर अथवा गजलकार दो से तीन हफ्तों में मौजूं गज़ल कहना सीख सकता है। रुक्न बहर आदि के नाम आम बोलचाल की भाषा में हैं व बहर के नाम से ही अरकान व उनकी तरतीब की जानकारी मिल जाती है न तो अरकान व बहर के नाम रटने पड़ते हैं न ही मात्राओं को गिनना पड़ता है। यह व्याकरण उनके उस्ताद स्वर्गीय पंडित नारायण सिंह गाफ़िल द्वारा ईजाद की गई जिसमें डॉ. विजय मित्तल ने कुछ आवश्यक जानकारी जोड़ी है।<br>पुस्तक के दो भाग हैं - पहले भाग में ग़ज़ल विधा का व्याकरण व दूसरे भाग में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले काफ़िये की सूची है।<br>मुझे उम्मीद है कि यह पुस्तक सभी शायरों व ग़ज़लकारों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।
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