कवि का भावलोक व्यापक होता है जिसमें सारी सृष्टि समाहित होती है। मैंने भी इस ‘गीत मंजूषा’ में अपने भावलोक का समग्र दिग्दर्शन कराने का प्रयास किया है। मानवीय संवेदनाओं शारीरिक भाव-भंगिमाओं सामयिक घटना-परिघटनाओं प्राकृतिक अवयवों का शब्द चित्र खींचने का यत्न किया है। विरह की पीर का आनंद सार्थक संदेश सामाजिक राजनैतिक विच्छृन्खलताओं मानव चरित्र पतन राष्ट्र के विकास अगम अगोचर पर दृष्टिपात के साथ विरह और प्रेम की विस्तृत विवेचना करने की कोशिश की गयी है। यह वह मंजूषा है जिसमें विविध रंगों का निचोड़ मिलेगा.....“नाम है वीरेंद्र विरही मैं विरह का गीत हूँ।दिल लुभाए हर किसी का वो मधुर संगीत हूँ॥”