परम ब्रह्म सच्चिदानन्दन योगिराज श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र में पाण्डुपुत्र अर्जुन के साथ किया संवाद श्री मन्मर्षि वेदव्यास प्रणीत ‘महाभारत’ के तृतीय खण्ड के उद्योग पर्व एवं भीष्म पर्व जम्बूखण्ड विनिर्माण-पर्व के पन्चविंशोध्याय में श्रीमद्भगवद्गीतायां प्रथमोध्याय ‘अर्जुनविषादयोग’ से लेकर मोक्ष संन्यासयोगोनामाष्टादशोध्यायः तक पच्चीस से लेकर तैंतालिस तक भीष्म पर्व में वर्णित है। मन्मर्षि वेदव्यास द्वारा ही श्रीमुख वाणी सम्पूर्ण वेदों के साथ-साथ श्रीमद्भगवद्गीता प्रणीत है जिसका पद्यानुवाद अपने आप में ही कितना दुरूह होगा। एक प्रयास किया गया है वह कितना मीमांसकों को प्रभावित कर पायेगा वह तो मीमांसकगण की मीमांसा ही तय करेगी। यह साहित्याकिंचन सुधीजनों विद्वतजनों को अपनी लेखनी से कितना प्रभावित कर सका है यह भविष्य में विद्वत समाज तय करेगा। यदि किसी प्रकार का कोई संशोधन सुधीगण द्वारा प्राप्त होगा वह अगले अंक में अवश्य संशोधन के रूप में लाया जायेगा। यदि कहीं अर्थ या भाव घट या बढ़ गया हो तो उसके लिए यह साहित्याकिंचन अति क्षमा प्रार्थी है।