हर औरत के महान व्यक्तित्व की क्षमता को उजागर करती यह कहानी गेंदू नाम की एक अनपढ़ महिला की हैं जो एक फैक्टरी में चाय बनाने का काम किया करती हैं। उम्र के लिहाज से वह ‘‘महिला’’ दरअसल एक कम-उम्र विधवा ‘‘लड़की’’ हैं जो एक माँ भी हैं। भ्रूण-हत्या दहेज-प्रथा बाल-विवाह पढ़ाई-लिखाई औरतों के काम करने के प्रति उनकी स्वतंत्रता रोजगार जात-पात और नशे-पते आदि जैसे गम्भीर मुद्दो को दर्शाती इस कहानी में इन सब से जुड़े उसके कठिन और चुनौतियों भरे जीवन के सफर को दिखाया गया हैं। महिला-सशक्तिकरण एवं नारी-शिक्षा के महत्व पर जोर डालते हुए ये किताब हमें बखूबी तरीके से यह बताती हैं कि ‘‘औरत’’ शब्द का अर्थ ‘‘कमजोर’’ बिल्कुल नहीं होता और औरतों को वास्तविकता में किसी के भी सहारे की जरूरत नहीं होती। --- मेरा नाम मोहसिन खान गौरी हैं। मैं राजस्थान की सूर्य-नगरी जोधपुर का निवासी हूँ। मेरा जन्म को एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। मेरे पिता जी श्री बदरुदीन गौरी राजस्थान-पुलिस के कर्मचारी हैं। मैंने जोधपुर से बी.सी.ए. में स्नातक स्तर की पढ़ाई की। इसके बाद उदयपुर से होटल-मैनेजमेंट और जयपुर से एम.बी.ए. जैसे कोर्सेज (पाठ्यक्रम) भी किये। इतने अलग-अलग प्रकार के कोर्सेज करने के बावजूद भी मुझे असली आनंद लेखन-कला के क्षेत्र में ही मिला। लेखनकला में मेरी दिलचस्पी वैसे बचपन से ही थी। कविता पाठ के साथ-साथ लेखन में मेरी रूचि स्कूल के समय में होने वाली कुछ लेखन-प्रतियोगिताओं और दोस्तों के उत्साहवर्धन और प्रशंसा के साथ-साथ बढ़ती गई। मुझे नए लोगों से मिलना उनसे बातें करना बहुत पसंद हैं। इससे मुझे अक्सर काफी कुछ सीखने को मिलता हैं जो कि मैं अपनी किताबों में इस्तेमाल भी किया करता हूँ। इसी लिए मेरी लिखावट में आम लोगों से जुड़ी भावनाएं साफ झलकती हैं।