सन् 712 ईस्वी से देश पर मुस्लिम आक्रमण की शुरुआत हुई जो 1761 ईस्वी तक विभिन्न रूपों में होती रही। देश के हिंदू इस पाशविक अत्याचार को सदियों सहते रहे और अपने हिसाब से उसका प्रतिकार भी करते रहे लेकिन इस दौरान मुस्लिम आतताईयों के द्वारा दी जाने वाली असहनीय पीड़ा को बहुत से हिंदू नहीं सह पाये और अपना धर्म छोड़कर मुस्लिम पथ अपना लिए लेकिन भयवश हुए इस पंथातरण के बाद भी मन से वह हिंदू धर्म से दूर नहीं हो पाये थे। लंबे काल तक परतंत्र में रहते रहते हिंदू समाज की आत्मसात करने वाली प्रवृत्ति धीरे-धीरे क्षींण होती गयी और सनातन धर्म की मुख्य धारा से जो लोग अलग हुए वह मुस्लिम जीवन पद्धति अपनाने लगे और बहुतों को अछूत बना दिया गया। हिंदू समाज की इस कमजोरी को लाल मुख वाले यूरोपीय विशेष कर अंग्रेज और बढ़ा दिये इस प्रकार से अलगाववादी भावना हिंदू से मुसलमान बने लोगों में बढ़ने लगी। यदि हम भारत की पिछले लगभग सौ वर्षों के इतिहास पर एक दृष्टि डालेंगें तो हम देश में एक ही समस्या सबसे विकट दिखाई देती है और वह है मुस्लिम अलगाववाद जिसको कम करने के लिए अनेक संगठन नेता प्रबुद्धजन महापुरुष समाजसेवी अपने-अपने ढंग से दसकों तक प्रयासरत रहे लेकिन यह समस्या दिनों दिन बढ़ती गयी। 1947 ईस्वी में देश के रक्तरंजित विभाजन के बाद भी जब इस समस्या को बढ़ने से कोई हिंदू नेता या संगठन नहीं रोक पाया उल्टे इस अलगाववादी मुस्लिम समाज का और तुष्टीकरण होने लगा तब इस देश के मुसलमानों में जिहादी प्रवृत्ति और बढ़ने लगी अपनी संख्या बल बढ़ाने के लिए उनके द्वारा अनेक खतरनाक कदम उठाए जाने लगे जिनमें सर्व प्रमुख है - लव जिहाद। जिस हिंदू धर्म की नारियां कभी अपने धर्म और सतीत्व की रक्षा के लिए जौहर व्रत धारण कर लिया करती थी उसी हिंदू परिवार में धर्म का इतना लोप होने लगा कि हिंदू लड़कियां स्वतः मुस्लिम बन जाने में जरा भी संकोच नहीं कर रही हैं। प्यार कभी भी अपने मूल धर्म व संस्कृति से अलग होकर नहीं किया जा सकता है। भारत माता व हिंदू धर्म से किया जाने वाला प्यार ही वास्तविक प्यार माना जा सकता है। अपने कोख से अलगाववादियों की संख्या बढ़ाने वाली भारत माता की बेटी नहीं हो सकती वह देश की परम शत्रु ही कही जायेगी। क्या वामपंथ अपने देश में धर्म से अलग हो जाने की शिक्षा दे रहा है। जब अपना हिंदू धर्म नहीं रहेगा राष्ट्र नहीं रहेगा राष्ट्रीय भाव तिरोहित हो जाएगा तब इस देश में कोई भी पथ नहीं बचेगा। चहुँदिशि केवल और केवल मुस्लिम कट्टरता फैली हुई दिखाई देगी। लोगों में धर्म का जागरण हो हिंदू मुस्लिम कट्टरता व अलगाववाद को पहचाने इसके लिए हिंदू अपने को कमजोर न समझे तथा अपने मजबूत भाव को और मजबूती दें उसी निमित्त एक उपन्यास घर वापसी लिखी गई है। जिसमें मुख्य पात्र वह है जिसे दुर्भाग्य से हिंदू समाज का अछूत वर्ग कहा जाता है जबकि धर्म की प्रधानता जिसके अंदर होती है वह जन्मना चाहे कुछ भी हो अछूत तो नहीं हो सकता है। और मुस्लिम समाज में जन्म लेने के बावजूद कैसे कोई व्यक्ति राष्ट्र और राष्ट्रीय धर्म सनातन धर्म के प्रति अपने को समर्पित कर सकता है तथा शुद्धिकरण नहीं बल्कि स्वयं की घर वापसी कर सकता है साथ ही इस मार्ग पर चलने के लिए अन्य लोगों को प्रेरित भी कर सकता है यही इस उपन्यास के लिखने के पीछे का मेरा मूल उद्देश्य है। हितेन सह तस्य भाव: इति साहित्यम की मूल सोच को प्रदर्शित करने वाला यह उपन्यास है जिसे आदरणीय पाठकगण जब बिना किसी पूर्वाग्रह की भावना से पढ़ेंगे और अपने को राष्ट्रीय भाव में तिरोहित कर लेंगे तो मैं समझूंगा कि मेरा प्रयास सार्थक हो जायेगा। शेष ईश्वर की कृपा तथा आप सभी के आशीर्वाद पर ही सब कुछ निर्भर है।
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