<p>कुछ भाष्यकार गीता को सिर्फ़ ज्ञान कर्म अथवा भक्तियोग का शास्त्र मानते हैं किन्तु यह किसी भूखे को पूरा भोजन न देकर दाल भात रोटी सब्जी में से कोई एक आइटम परोसने या धोती फाड़कर छोटे-छोटे रुमाल बनाने जैसा है। गीता का योग एकपक्षीय नहीं समग्र अर्थात सम्पूर्ण योग है जिसमें कुछ जोड़ या घटा नहीं सकते। यह मनुष्य मात्र के लिए अनुकरणीय व्यावहारिक जीवनोपयोगी अपरिवर्तनशील शाश्वत धर्म पर आधारित है। कर्म की यमुना और ज्ञान की सरस्वती जबतक भक्ति की गंगा में नहीं मिलती तबतक जीवन तीर्थराज प्रयाग नहीं बनता। जैसे पक्षी को उड़ने के लिए दो पंख और पूँछ चाहिए वैसे गीता का समग्र योग पाने के लिए कर्म ज्ञान व भक्ति आवश्यक हैं। ईश्वर के द्वार पर साधना के सारे मार्ग मिलकर एक हो जाते हैं। गीता के स्थितप्रज्ञ ज्ञानी ईश्वर के प्रिय भक्त गुणातीत दैवी सम्पदा जैसे प्रकरणों में वर्णित गुणों को एक माला में पिरोकर पहनने वाला समग्र योगी ईश्वरस्वरूप हो जाता है।<br> इसलिये इस पुस्तक में लेखक ने पहले गीता के सारे श्लोकों को सरस सुबोध शैली में अनेक उदाहरणों उपमाओं शास्त्रों व संतों के वचनों तथा बोधकथाओं द्वारा समझाया है। और फिर उपसंहार में समग्र योग की अवधारणा को शाश्वतधर्मगोप्ता भगवान श्रीकृष्ण के गीता में कहे वचनों से प्रमाणित किया है। <br> गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन के (अर्थात हर जिज्ञासु मनुष्य के मन में उठने वाले) कई प्रश्नों पर पहले दूसरों के मत बतलाते हैं फिर अति सुसंस्कृत शालीन सरल व मधुर भाषा में अपना win win मत बताते हैं और नियमों के बन्धन में न बाँधकर निर्णय उसी पर छोड़ देते हैं। इसका श्रद्धापूर्वक अध्ययन करके उसके अनुसार चलने से न केवल हिन्दू बल्कि प्रत्येक मानव जीवन के सारे कष्टों और संशयों से छूटता है तथा देहांत के बाद पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। अत: इसे प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए।</p>