श्री मद्भगवद्गीता विश्व के धार्मिक ग्रंथों में विशेष स्थान रखती है। इसका विश्व की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। वैसे तो गीता का समय पाँच हजार साल से अधिक पहले का माना जाता है परन्तु गीता में जो ज्ञान दिया गया है वह अनादि और सनातन है। गीता एक स्वतंत्र पुस्तक नहीं है परन्तु महाभारत का एक भाग है। गीता हिंदुओं के लिए धार्मिक ग्रंथ है लेकिन हिंदुओं के धर्म ग्रंथ वेद ही हैं। वेद अपौरुषेय और अनादि हैं। गीता का महत्त्व इसी बात से पता चलता है कि आज भी अदालतों में गीता पर हाथ रखवाकर शपथ लेने की प्रथा प्रचलित है जो अंग्रेजों के समय से चली आ रही है। यह बड़ी दुःख की बात है कि आज लोग गीता की कसम तो खाते हैं लेकिन उसे ध्यान से पढ़ने समझने और उसके उपदेशों का पालन करने में आलस्य करते हैं। इसके कारण लोगों में गीता के बारे में कुछ भ्रांतियाँ पैदा हो गई हैं उनका निराकरण करना जरूरी है।