गुरु परताप साध की संगति :ओशो स्वयं तूफानों के पाले हुए थे। और उनका अक्षर-अक्षर मुहब्बत का दीया बनकरउन तूफानों में जलता रहा... जलता रहेगा। जिस ओशो से मैंने बहुत कुछ पाया है यह अक्षर उन्हीं के नाम- अर्पित करती हूं -कह दो मुखालिफ हवाओं से कह दो मुहब्बत का दीया तो जलता रहेगा...''अमृता प्रीतमपाथेय :खुद अपना उदाहरण देकर ओशो ने एक आजादी हमारे दिलो-दिमागों को दी है। एक पूरे दौर को उन्होंने मुक्ति दे दी है। इस मरी हुई दुनिया में जान डाल दी है इसकी नसों में प्यार बहाकर । मैं तो बार-बार यही कहता हूं कि हमें धन्यवाद देना चाहिए इस आदमी का जो यह अनमोल पूंजी युगों-युगों के बच्चों के लिए छोड़ गया है।
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