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About The Book
Description
Author
सार्थक जीवन जीने के लिए मानवीय मूल्यों का आदर एवं सुरक्षा करना हर मानव का परम कर्तव्य होता है। नेक कर्म करने से मन को प्रसन्नता मिलती है और आत्मा को सुकून भी मिलता है। कड़ा संघर्ष किए बिना मनचाहा मुकाम नहीं मिलता। सभ्य एवं शांतिपूर्ण जीवन एक उत्तम जीवन होता है। अपने आप को किसी न किसी कार्य में व्यस्त रखना चाहिएं। तभी धन की देवी प्रसन्न होती है और धन-धान्य का भंडार भरता भी है। लोगों के साथ प्रेम पूर्वक किया गया व्यवहार अमिट छाप छोड़ जाता है। अपना होकर भी जो व्यक्ति अपनों का साथ न दे वह कभी अपना नहीं हो सकता। पराधीनता की बेड़ियां जब तक नहीं टूट जातीं तब तक आप स्वतंत्र होने का अहसास नहीं पाएंगे। जल पात्र में जल तभी ठहरता है जब उसमें कोई छेद न हो। उसी प्रकार मनुष्य में अच्छे-अच्छे गुण तभी वास करते हैं जब उसमें कोई दुर्गुण न हों। जब किसी की ओर उंगलियां उठतीं हैं तो उसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है ।