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About The Book
Description
Author
...इस उपन्यास में जितनी भी घटनाएं आयी हैं वे कमोबेश इसी रूप में घटी हैं। ऑफिस में कोई भी दिन ऐसा नहीं होता था जब इस तरह की घटनाएं न घटती हों। मैनेजमेंट के सामने मजबूरी थी कि उसे स्पष्ट आदेश थे कि कोई भी औद्योगिक विवाद नहीं होना चाहिए और सारे मामले शांतिपूर्ण ढंग से निपटाए जाने चाहिए। नतीजा यह होता था कि यूनियनों और संगठनों के कागजी शेर दिन भर फूं फां किये रहते थे और माहौल को खराब किए रहते थे। चाहे व्यक्ति के स्तर पर हो या यूनियन स्तर पर सबको खुली छूट मिली हुई थी और कोई भी अदना सा कर्मचारी या यूनियन मेंबर किसी भी अधिकारी को मैनेजमेंट को या किसी भी संबंधित पक्ष को हड़का देता था। कोई भी स्टाफ सदस्य किसी भी अधिकारी पर चढ़ बैठता था और किसी का भी मान अपमान कर देता था। सबको पता था कि कर्मचारी के पीछे यूनियन है और अधिकारी अकेला है। कर्मचारियों द्वारा अधिकारियों को थप्पड़ मारने के किस्से तो अक्सर होते रहते थे। सुनवाई कहीं नहीं थी। हड़ताल वाले एक दिन यूनियन के लोगों ने एक वरिष्ठ अधिकारी को अपने केबिन में काम करते हुए देख लिया था। सब उस पर चढ़ बैठे थे और उसे उठा कर खिड़की से बाहर फेंकने के लिए तैयार हो गये थे। उससे हाथ जोड़ कर माफी मंगवायी गयी थी तभी उसे छोड़ा गया था। मुझे खुशी है कि अब के उपन्यास अपने संशोधित रूप में न्यू वर्ड पब्लिकेशन से 25 बरस बाद आ रहा है। जब यह उपन्यास छपा था तो वरिष्ठ लेखक जगदंबा प्रसाद दीक्षित कामता नाथ और आबिद सुरती को बहुत पसंद आया था। आबिद सुरती तो आज भी इसका जिक्र करते हैं। ---सूरज प्रकाश