यह पुस्तक एक ऐसे व्यक्ति का अपने प्रारंभिक जीवन का अवलोकन है जिसने अपने जीवन के 25 वर्ष पराधीन भारत में और शेष 48-49 वर्ष स्वाधीन भारत में बिताए। पुस्तक में जबलपुर जैसे शहर और उत्तर प्रदेश के एक गांव की 1920 और 1930 के दशक की एक परिवार की कथा के साथ तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों का भी संकेत मिलता है।