इस पुस्तक में मेरी छंद से बाहर रचित कवितायें संग्रहीत हैं। इससे पहले गजल गीत की मेरी दो किताबें यहीं से प्रकाशित हो चुकी हैं। मेरे किसानी जीवन के किशोर युवा वय के जीवनानुभव ग्राम्यांचल-गांव के खेतिहरों के बाह्य तथा आंतरिक संघर्ष उत्पीड़न त्रस अभाव जिजीविषा धैर्य विश्वास तथा आश-भरोस से जुड़े हैं। जिनमें मैंने स्वयं भी सक्रिय भागीदारी की है। वर्षा ठंड घाम थकान प्यास-पसीना हीच-हल्कानी बीज हल-बैल जुताई बुवाई सिंचाई खली-चुनी सानी-भूसा ओला पाला बाढ़ सूखा मंडी बाजार बनिया-व्यापारी लोभ-लाभ हानि बीमारी उधारी दवाई पढ़ाई आदि यह सब कुछ जो- जैसा स्वानुभूत है मेरी कविता में सहज ही आता रहा है। इधर पत्रिकाओं में प्रकाशित मेरे कई संस्मरण इसके प्रमाण हैं। मेरी ये कवितायें पिछली सदी के आिऽरी दो दशक से लेकर इस सदी के तीसरे दशक तक की रचना- यात्र हैं। इनमें चमत्कृत करती आरोपित कलात्मकता नहीं बस निरे गंवई खेतिहर जीवन की गोबर-माटी श्रम पसीने से बंधी उम्मीद और जूझने की अदम्य साहसिकता का सच ही इनमें खूब रचा-बसा है। मेरे नवगीत जनगीत दोहे गजल संस्मरण कहानियों और उपन्यासों का मूलाधार भी यही विराट श्रम संवेदना है।--देवेन्द्र कुमार पाठक