साहित्य से लेकर जीवन तक सम्यक की साधना करने वाली सुमन केशरी ने स्त्री-मन किसान-मजदूर प्रकृति पर अपनी रचनात्मक प्रतिबद्धता सिद्ध की है। महाभारत के हाशिए में पड़े एक महत्वपूर्ण चरित्र ''हिडिंबा'' को केंद्र में रखकर लिखा गया यह नाटक जितना इतिहास और मिथक का हिस्सा है उससे कहीं अधिक यह वर्तमान का प्रतिबिंब है। सुमन जी पिछले पैंतीस वर्षों से महाभारत को पढ़ व उसे अपनी दृष्टि से पुनर्सृजित कर रही हैं। हिडिंबा के माध्यम से एक स्त्री मन की परतें खोलते समय सुमन केशरी ने उस कालखण्ड की विसंगतियों को भी इंगित करते हुए उनकी वर्तमान समय में किसी अन्य स्वरूप में उपस्थिति को भी चिन्हित करते हुए कुछ सार्थक प्रश्न उठाए हैं। इस नाटक के माध्यम से वनवासी समुदाय और उनके अस्तित्व संकट की गंभीरता को प्रकट करने में भी सुमन जी सफल रही हैं।
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