केदारनाथ और बदरीनाथ का यह अपनी तीसरी यात्रा का वर्णन है। मैंने सोचा यात्रा से मिली संतुष्टि और अपार आनन्द को बाँटा जाय जिससे बाकी जन भी यात्रा से प्रेरित होकर स्वयं भी यात्रा का रोमांच और आनन्द अनुभूत करें। यात्रा के वर्णन का मेरा पहला आलेख १९८१ की केदार-बदरी की प्रथम यात्रा का ही था; जो मैंने लगभग चार पन्नों में अपनी दीदी-जीजाजी को पत्र के रूप में लिखा था। उस समय पत्र भी यात्रा अभियान या यात्रा विवरण के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज होते थे। पत्रों के बहाने सुलेख और व्याकरण का भला अभ्यास हो जाता रही–सही कसर माँ पूरा करती हमारे लिखे पत्रों में व्याकरण की कई गलतियाँ ढूँढकर हमें फिर लिखने को कहती। मोबाइल क्रांति ने कागजी पत्रों की सुन्दर दुनिया को अलविदा कह दिया है यद्यपि पत्र अभी भी लिखे जाते रहे हैं पर ईमेल के रूप में न कलम–पेन की दरकार और ना ही सुलेख के मोती जैसे शब्दों का रचता संसार।