हिंद स्वराज गाँधी जी द्वारा 1909 में लिखी गई अति महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसे लन्दन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए जहाज पर हिन्दुस्तानियों के हिंसावादी पंथ को और उसी विचारधारा वाले दक्षिण अफ्रीका के एक वर्ग को दिए गए जवाब के रूप में यह लिखा गया था। यह मूलतः गुजराती भाषा में है। यह गाँधी जी की दृष्टि से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम राजनीतिक विचार और सामाजिक दृष्टिकोण को विभिन्न आयामों से समझाती है। इसने भारतीयों का पीढ़ी दर पीढ़ी मार्गदर्शन किया है। यह आज भी उतनी ही प्रासंगिक प्रामाणिक और लोकप्रिय है जितनी कि यह लिखे जाने के समय थी। इसके जरिए गाँधीजी ने भारत की स्वतंत्रता के सही मायने और आत्मनिर्भर स्वराज की संकल्पना को स्पष्ट किया है। गाँधी जी ने साधन और साध्य की पवित्रता पर बल दिया यानी स्वराज एक पवित्र साध्य (लक्ष्य) है इसीलिए इसकी प्राप्ति का साधन भी पवित्र होना चाहिए। स्वतंत्रता क्या है और इसे कैसे प्राप्त किया जाएगा जैसे प्रश्नों का गाँधी जी ने उत्तर प्रदान किया है। गाँधी जी ने स्वयं कहा है मेरी राय से यह किताब ऐसी है कि यह बालक के हाथ में भी दी जा सकती है। यह द्वेषधर्म की जगह प्रेमधर्म सिखाती है; हिंसा की जगह आत्मबलिदान को रखती है; पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है।