सिनेमा सम्बन्धी लेखन की शुरुआत किसी हद तक इस माध्यम के अस्तित्व में आने के आसपास ही हो चुकी थी। हालाँकि यह भी सही है कि इस महत्वपूर्ण और प्रभावशाली माध्यम के प्रति कथित उच्च-संस्कारित वर्ग में लम्बे समय तक उपेक्षा और तिरस्कार का भाव रहा। हिंदी सिनेमा के आरंभिक चार-पांच दशक का परिवेश हम देखें तो पता चलता है कि तब फिल्मों में काम करना फिल्में बनाना और देखना यह वर्ग सम्मानजनक नहीं मानता था। ज़ाहिर है ऐसे में फिल्मों पर केन्द्रित पत्र-पत्रिकाओं का उनके घरों में प्रवेश वर्जित था। इसके बावजूद फिल्मों पर लिखा भी जाता रहा और पढ़ा भी! बाद में तो फिल्म केन्द्रित पत्र-पत्रिकाओं की बाढ़ जैसी आ गयी। बेशक इनमें से ज़्यादातर सस्ती और अगम्भीर किस्म की थीं। गॉसिप और मनगढ़न्त साक्षात्कार-ख़बरों वाली! सस्ते मनोरंजन टाइप की वक़्त काटनेवाली! जिनके बिक्री केन्द्र थे बस-स्टैंड रेल्वे स्टेशन जैसी जगहें और वहाँ के हाकर! यक़ीनन ये पत्रिकाएँ भी ख़ूब पढ़ी जाती रहीं। इनके पाठक ज़्यादातर वे लोग रहे जिनकी रुचि फिल्मों की सतही चीज़ों में थी सिनेमा के गम्भीर रचनात्मक पक्ष में नहीं।