HINDITAR SANT KAVITRIYON KE SAMAJIK DRISTI

About The Book

भारत विभिन्न संस्कृतियों व बोलियों का देश है। भारत के संदर्भ में यह कहावत सही लगती है कि ''कोस-कोस पर बदले पानी चार कोस पर बदले बानी।'' अतः भारतीय संत परम्परा का विपुल साहित्य यहाँ की अनेक बोलियों में संग्रहित है। मराठी कन्नड़ तेलुगू तमिल उड़िया असमिया बंगाली गुजराती व हिन्दी। हिन्दी भाषा आसानी से ग्रहण की जाने वाली भाषा है किंतु अन्य भाषाओं के साथ ऐसा नहीं है। हिन्दीतर भाषाएँ प्राकृतिक वातावरण और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल बनी हुई बोलियाँ है। जिनमें हिन्दीतर संत कवयित्रियों ने अपना काव्य सृजन किया। इस पुस्तक संत कवयित्रियों के साहित्य के माध्यम से तत्कालीन समाज लोक जीवन लोक भाषा उस समय की सबसे बड़ी समस्या जाति वर्ण वर्ग पर इन कवयित्रियों के मतों को जानने की कोशिश की गई है। चाहे हिन्दी संत कवयित्री हो या हिन्दीतर दोनों ने ही सामाजिक आडम्बरों पर अपने काव्य के माध्यम से करारी चोट की है। मात्र चोट ही नहीं पहुँचाई वरन् पूरे समाज को इन बाह्यचारों आडम्बरों थोथी मान्यताओं से दूर रहने के लिए चेताया है। इन कवयित्रयों को पढ़ते हुए ज्ञात होता है कि यह कवयित्रियां अपने काव्य में जीवन के हर पहलू को मार्मिक रूप से प्रस्तुत करती हैं। मीरा की पीड़ा विरह वेदना उसकी भावों की उत्तेजना को क्या कोई अन्य कलमबद्ध कर सकता है? इसी प्रकार अक्कमहादेवी के प्रेम उसकी विह्वलता और विरह वेदना को कोई अन्य लिख सकता है? उसी प्रकार ललद्यद बहिणाबाई आदि अन्य कवयित्रियों के भावों को कोई कैसे बता सकता है? अंगर व्यक्त करेगा भी तो भावों की वह उत्तेजना प्रखरता मार्मिकता आदि का लोप होना स्वाभाविक ही है। इन कवयित्रियों का काव्य अपना भोगा यथार्थ है. जीवन की अनेक बाधाओं की कहानी है और सबसे बड़ी बात यह है कि स्त्री का अपना भोगा हुआ कष्टमयी जीवन उसकी अपनी वाणी से निकला है जैसे मीरा ने कहा है ''जाकै पैर न फटे बिवाई सो क्या जाने पीर पराई'' अक्कमहादेवी ने भी कहा है ''बाँझ क्या जाने प्रसव पीड़ा'' ललद्यद भी कह उठती हैं कि ''जो कभी गर्भिणी नहीं हुई वो प्रसूता का आहार क्या जाने?'' अतः कुल मिलाकर इन कवयित्रियों ने अपने हिस्से के सच को अपनी वाणी से अपनी पीड़ा और दुःख को समाज तक पहुँचाया। इन कवयित्रियों ने मात्र अपनी पीड़ा ही नहीं बताई अपितु समाज में उपस्थित बाह्यचारों पर भी खुलकर विचार किया। इन कवयित्रियों ने शास्त्रों को भूसी पोथियों को पढ़ने वालों को ढोंगी तक कह डाला। इन संत कवयित्रियों में पूरे समाज से लड़ जाने की निडरता और साहस साफ तौर पर इनके पदों दोहों वाखों वचनों अभंगों में नजर आती है। कवयित्रियों द्वारा तत्कालीन समाज की जिन बुराईयों का पुरजोर विरोध किया गया वह आज भी हमारे समाज में अपनी जड़ों को मजबूत किए बैठी हैं। बाह्याचार जाति-प्रथा अंधविश्वास आज भी समाज में उसी प्रकार व्याप्त है जिनका विरोध इन्होंने किया। ....... *डॉ. अर्चिता सिंह*
Piracy-free
Piracy-free
Assured Quality
Assured Quality
Secure Transactions
Secure Transactions
Delivery Options
Please enter pincode to check delivery time.
*COD & Shipping Charges may apply on certain items.
Review final details at checkout.
downArrow

Details


LOOKING TO PLACE A BULK ORDER?CLICK HERE