पुस्तक का भाव क्या है इस संबंध में मैं कुछ कहूँ इसकी अपेक्षा यही उत्तम प्रतीत होता है कि उसे पाठकों की स्वतंत्र आलोचना पर छोड़ दूँ। यह बड़ी ही अनुचित बात है कि लेखक विषय-प्रवेश से पहले ही कोई पूर्वग्रह स्थापित कर ले और अपनी कल्पना से ही पाठकों के मस्तिष्क में उन विचारों पर अंधविश्वास का बीज आरोपित कर दे जिन्हें उसने सिद्ध करने की पुस्तक में चेष्टा की है। मैं अपनी गँवारू भाषा में इस जबरदस्ती को 'थॉल' कहता हूँ। तब इतना अवश्य कहना उचित समझता हूँ कि समस्त प्राणियों का कार्य-कलाप दो प्रधान शक्तियों द्वारा संचालित होता है जिनमें एक का अधिष्ठान मस्तिष्क है और दूसरी का हृदय। पहली शक्ति की प्रबलता से मनुष्य में ज्ञान वैराग्य कर्तव्य और निष्ठा का यथावत् उदय होता है किंतु दूसरी शक्ति केवल उत्तेजना के वशीभूत आँधी और तूफान की तरह कभी-कभी इतनी प्रबलता से संचरित होती है कि उसमें मनुष्य का ज्ञान कर्म निष्ठा और विवेचना सब लीन जैसी हो जाती है। उस दशा में मनुष्य का हृदय जितना ही सुंदर सरल और भावुक होता है उतना ही वह पतन के मार्ग पर त्वरित गति से बहक जाता है। संसार में अनेक अपराध हृदय की सौंदर्य-लिप्सा के कारण होते हैं। अनेक पुरुष अपने हृदय की कोमलता को दूषण समझते हैं। यदि किसी तरह वे अपने हृदय को कठोर बना सकते तो अवश्य वे महान् पुरुष सिद्ध होते। किंतु निश्चय ही हृदय का सुंदर होना पाप नहीं है। इसीलिए आपराधी को अपराधी ठहराने में बड़े भारी विचार-विवेचन की आवश्यकता है। भगवान् बुद्ध कदाचित् ऐसे ही पारखी थे। उनका सिद्धांत था कि अपराध हुआ है इससे प्रथम यह देखो कि अपराध क्यों हुआ है? हमारे पाठक इस पुस्तक में कुछ पालों को ऐसा ही अपराधी पाएँगे जिन्हें वे घोर अपराध का पात्ल समझकर भी कदाचित् सहानुभूति की दृष्टि से देख सकें। यदि मेरी यह धारणा सत्य हुई तो मैं अपने प्रयत्न को कुछ अंशों तक सफल समझेगा। - इसी पुस्तक से
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