यह रचना आपसी रिश्तों की खट्टी-मीठी नोंक-झोंक को एक सहज भाव को प्रदर्शित करने की कोशिश करती है। जिसमें दिन-प्रतिदिन हो रहे परिवर्तनों को लेखक ने एक हास्य एवं चिंतनीय ढंग से “हसबैंड” नामक कहानी की तुलना एक “बैंड” से की है। क्योंकि लेखक का ऐसा मानना है कि ‘बैंड’ और ‘हसबैंड’ दोनों का एक ही काम है बजना बस दोनों में फर्क़ इतना हैं कि एक को पीटकर बजाया जाता है तो दूसरे को सुनाकर। “हसबैंड का काम है हँसना मतलब हँसता हुआ बाजा।” समाज में लड़कों की शादी होने से पहले उन्हें सभ्य एवं सही होने का परिचायक समझा जाता हैं । और फिर उसकी शादी होने के बाद कैसे वही नाते-रिश्तेदार उन बरसाती मेढ़कों की तरह टर्र-टर्र करने लगते हैं। जिससे उसकी सारी अच्छाईयाँ बुराईयों में बदल जाती हैं।
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