सरिता स्निग्ध ज्योत्स्ना का पहला कविता संग्रह है यह जो बेटियों के जीवन पर आधारित है। बेटियाँ लक्ष्मी मानी जाती रही हैं जो जन्म किसी घर में लेती हैं और जीवन कहीं और व्यतीत करती हैं। वह पिंजरा होता है तभी कवयित्री ने लिखा है— —“पता/ पिंजरे का कोई स्थायी पता नहीं होता/ विशेष जानकारी लेनी हो तो/ त्रिशंकु से पूछ लें” गर्भ में शंकित बेटी से लेकर मीना कुमारी तक की पीड़ा का जायजा लिया गया है। कवयित्री को अशेष शुभकामनाएँ! -पद्मश्री डॉ. उषाकिरण खान