यह पुस्तक भारतीय लोकतंत्र के तीन स्तंभ—विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका—की कार्यप्रणाली पर विचार करती है। इसमें तर्क दिया गया है कि ये व्यवस्थाएँ जनता के कल्याण के बजाय उनके दमन के लिए बनाई गई थीं विशेष रूप से औपनिवेशिक काल में। मैकाले द्वारा निर्मित कानून और न्याय प्रणाली को एक झुनझुने के रूप में प्रस्तुत किया गया ताकि जनता के रोष को दबाया जा सके। आज इन व्यवस्थाओं में कई खामियाँ सामने आ रही हैं जो संकेत देती हैं कि इन्हें परिवर्तित करने का समय आ चुका है। पुस्तक बदलाव की आवश्यकता और उसकी दिशा पर प्रकाश डालती है।