व्यंग्य विसंगतियों पर आलोचनात्मक प्रहार है जो बेहतर समाज बनाने में मदद करता है। एक रचनाकार होने के नाते मुझे यही समझ में आता है कि हमें समाज ने जो दिया है; कम-से-कम उतना तो वापस देना ही चाहिए। शायद इसीलिए मैंने व्यंग्य के जरिये या कहो कि लेखन के जरिये जुल्म और शोषण के खिलाफ आवाज उठायी है। मैं इसमें कितना सफल होती हूँ यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।