यदि यह कविता बन सकी एक थकीहुई मगर अजेय स्त्री की पहचान तोयह कविता रहेगी असमाप्त। औरयह दुनिया जब तक रहेगी चैन सेनहीं रहेगी।समकालीन स्त्री कवियों की दुनिया में बल्कि समूची वामधारा की हिन्दी कविता में कात्यायनी का अपना एक अलग स्थान और विशिष्ट पहचान है। उनकी कविताएँ हमारे समय की त्रासदियों-विडम्बनाओं भरे अँधेरे से निरन्तर युयुत्सु मुठभेड़ करती हैं। वह स्मृतियों और कल्पनाओं-स्वप्नों की खदानों से अपनी कविता के लिए कच्चा माल लाती हैं और अपना सर्वथा मौलिक बिम्ब-विधान एवं अनूठी अभिव्यक्ति शैली निर्मित करती हुई इस जटिल संक्रमणकालीन देश-काल का आधिकारिक आख्यान प्रस्तुत करती हैं। यथास्थिति की निर्मम आलोचना और प्रतिगामी शक्तियों का हठी प्रतिरोध उनके काव्यजगत में सर्वव्यापी है लेकिन इसके साथ ही उसके व्यापक दायरे में प्यार ममता दुख उदासी कविता की भूमिका स्त्री विमर्श और रोज़मर्रा के जीवन के व्यापक वर्णक्रम की बहुविध उपस्थिति देखने को मिलती है। इस मायने में उनकी कविता के आकाश का विस्तार अनन्य है। कविता को वह मानवीय ज़रूरतों की तड़प पैदा करने वाली मानवीय ज़रूरत तथा बहिर्जगत एवं अन्तर्जगत के तमाम रहस्यों को अनावृत्त करने का औज़ार मानती हैं और रोज़मर्रा के तमाम ज़रूरी सामानों में उसे शुमार करती हैं। कविता की मूलगामी प्रकृति को वह वर्चस्व विरोधी मानती हैं और कहती हैं कि “कविता को रहस्य बनाना उसे राज्यसत्ता के पक्ष में खड़ा करना है। कविता को कर्मकाण्ड बनाना उसे कर्मकाण्ड के पक्ष में खड़ा करना है जैसे कि कविता को विद्रोही बनाना उसे विद्रोह के पक्ष में खड़ा करना है”। इस मायने में उनकी कविता उनका अपना आविष्कार है।