वास्तव में यह कविता संग्रह प्रकाशित तो दो वर्ष पूर्व ही होना था परंतु कोरोना काल में लॉकडाउन के कारण नियमित लेखन का अवसर मिला तो दैव प्रेरणा से 'द्रोण प्रतिज्ञा' काव्य कथा तैयार होकर प्रकाशित हुई जो सुधी पाठकों द्वारा खूब सराही गई। अब ये ‘जागा स्वाभिमान देश का’ आपके हाथों में है। इसकी कुछ कविताएँ तात्कालिक राजनीतिक घटनाक्रमों पर आधारित हैं। जो ज्यादा पुरानी घटनाओं पर आधारित हैं। उन्हें पुराने पन्नों से ... भाग में स्थान दिया है। वास्तव में ये पुरानी बात होकर भी नवीनता का आभास कराती हैं। देश का नेतृत्व करने वाले नेताओं का अच्छी नीतियों पर आभार भी व्यक्त किया है तो कहीं उनके कमजोर निर्णयों पर निष्पक्ष होकर शंका भी व्यक्त की गई है। अपने कवि धर्म का पालन करते हुए जन भावनाओं का प्रतिनिधि बन नेतृत्व को चेतावनी देने की कोशिश भी की है। भारी भरकम साहित्यिक शब्द और अलंकारों की दृष्टि से सदा स्वयं को गरीब ही समझता हूँ। सीधी सपाट भाषा में ही अपनी बात को कहता चला जाता हूँ। इसके लिए सुधीजनों से क्षमा प्रार्थी हूँ। कविता के केंद्र में राष्ट्र और समाज ही हैं। कविताओं के विषय का वर्णन पृथक से नहीं किया गया है। साहित्य प्रेमी देश के जागरूक नागरिक कविता को पढ़कर ही घटना और उसके कारणों को समझने में सक्षम हैं ऐसा मेरा विश्वास है। मेरे प्रेरक पिता श्री गिरिराज प्रसाद भारद्वाज मेरी जन्मभूमि वैर वहाँ के साहित्यमय वातावरण और उस वातावरण के निर्माता सभी कवि साहित्यकार एवं विद्वतजनों को पुनश्च प्रणाम! आभार बड़े भाई श्री हरगोविंद शर्मा जी का जो भाभी जी की असाध्य बीमारी के कारण मानसिक तनाव में रहते हुए भी मेरा हौसला बढ़ाते रहे। श्रीमती रीमा सिंह जी का विशेष आभार जिन्होंने अपनी व्यस्ततम दिनचर्या में से इन कविताओं को टंकण और व्यवस्थित करके प्रकाशित कराने हेतु उत्साहपूर्वक समय ही नहीं निकाला बल्कि आगे बढ़कर पुस्तक रूप देने का आग्रह भी किया। साथ ही पाठकों से ‘द्रोण प्रतिज्ञा’ की भूमिका में किये गये मेरे वादे को याद भी दिलाया। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के क्षेत्र संगठन मंत्री डॉ. विपिन चन्द्र जी पाठक का भी धन्यवाद करता हूँ जिन्होंने अपने अति व्यस्ततम समय से समय निकालकर मेरी पांडुलिपि का अवलोकन कर अपने उत्साहवर्धक शब्दों में प्रस्तावना लिखी।आपका हीदेवेन्द्र भारद्वाज