...इस संग्रह में जीवन और समाज के हर पक्ष को बड़ी बारीकी से देखा और परखा गया है। जीवन और समाज की विसंगतियों एवं समय के कटु यथार्थ से साक्षात्कार कराती ये लघुकथाएं पढ़कर लगता है कि हमारा आपका सबका देखा एवं महसूस किया सच इनमें है। धर्म के नाम पर हो रही ठगी राजनैतिक भ्रष्टाचार साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने की साजिश हों अथवा समाज सुधार के नाम पर धोखा विवेकहीन स्वार्थ-अंधता की दौड़ हो अथवा रिश्तों के नाम पर पहुंचाने वाली आत्मीय चोट हर कदम पर एक सहज और संवेदनशील मनुष्य ही आहत होता है। यह दर्द इस संग्रह की तमाम लघुकथाओं में महसूस किया जा सकता है। इन लघुकथाओं का फलक अत्यंत विस्तृत है। रचनाकार एक सफल व्यंग्यकार भी है जिसकी स्पष्ट झलक उनकी लघु कथाओं में दिखाई देती है।... - डॉ. सुनील