कंपनी के दफ्तर के सामने मजदूरों की एक लंबी लाइन लगी हुई थी। लाइन में खड़े मजदूर अति प्रसन्न प्रतीत हो रहे थे कारण आज वेतन मिलने का दिन था। आज सबके घर अच्छे-से-अच्छा भोजन बनेगा। घर वाले भी इनकी राह देख रहे होंगे क्योंकि आज उनके जीवन की आवश्यकताओं के पूरी होने का दिन था। चाँदी के चंद सिक्के जैसे मजदूर का जीवन बस इन्हीं में दबा पड़ा है। राजन सबकी मुखाकृतियों को देख रहा था-सामने से कुंदन आता दिखाई पड़ा। वह भी आज बहुत प्रसन्न था। निकट आते ही बोला ‘क्यों राजन? तुम्हें भी कुछ मिला।’ ‘नहीं तो।