पुस्तक अंश : कवि आलोचक और पत्रकार नवल किशोर कुमार की पुस्तक ‘जातियों की आत्मकथा’ भगवान दास की ‘मैं भंगी हूँ’ के बाद अनेक जातियों के उद्भव और विकास पर किया गया पहला बड़ा काम है जो न केवल जातियों के समाजशास्त्र को समझने की दृष्टि से अपितु इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह जातियों से जुड़े ब्राह्मणवादी अर्थशास्त्र और राजनीति की परतें भी उधेड़ती है। लेखक का कहना है कि आज हर जाति एक कालोनी बन गई है। उस कॉलोनी से कोई भी जाति बाहर आना नहीं चाहती। निस्संदेह यह चेतना जाति के विनाश में एक बड़ी बाधा है। यही चेतना नवल की इस कृति में प्रत्येक जाति की आत्मकथा के केन्द्र में दिखाई देती है।- कँवल भारती ...जाति के विनाश का उद्देश्य ही इस किताब का असली मकसद है। लेकिन यह कैसे मुमकिन है इसकी एक राह इस पुस्तक में है। कई बार लोग तमाम तरह की बातें करते हैं कि जाति-व्यवस्था का अंत कैसे होगा। कुछ यह तर्क देते हैं कि रोटी-बेटी का संबंध बनाने से जाति का अंत हो जाएगा। यह एक उपाय अवश्य है। लेकिन यह तो तब मुमकिन है जब लोग यह जान सकें कि रोटी-बेटी का रिश्ता बन सके यह माहौल कैसे बनेगा। इसके लिए जो विचार आवश्यक हैं उनकी ही प्रस्तावना यह किताब करती है। इस प्रस्तावना के चार अहम भाग हैं- सांस्कृतिक सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक। यह किताब जहां एक ओर जातियों के सांस्कृतिक विमर्श को आत्मकथात्मक रूप से प्रस्तुत करती है वहीं दूसरी ओर यह उस संस्कृति से भी परिचित कराती है जो एक ही जाति के लोगों द्वारा अलग-अलग क्षेत्रें में अपनाई जाती है। यह क्यों है इसे समझने के लिए यह कहना आवश्यक जान पड़ता है कि जिसने अपनी जाति की संस्कृति को नहीं जाना वह अन्य जातियों के लोगों के साथ सौहार्द्रपूर्ण व्यवहार कैसे करेगा। यही तो जाति के विनाश की दिशा में पहला कदम है। -नवल किशोर कुमार