मैं कोई ग़ालिब गुलजार या दुष्यंत कुमार नहीं और न ही मैं उतनी काबिलियत रखता हूं। ये बहुत ही महान शख़्सियत थे उनकी बराबरी करना मेरे बस की बात नहीं। यह रचना आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत है आप इसे कुछ भी कह सकते हैं ग़ज़ल विचार नज़्म कहानी; क्योंकि मुझे पता ही नहीं ग़ज़ल नज़्म कविता लिखने के क्या नियम हैं। पर मैं इस कुंभ में उतरकर नहाने आया हूं इसमें कितनी डुबकी मैं लगा पाता हूं या बिना स्नान किए ही वापस लौटकर आना पड़ेगा क्योंकि कुंभ में मैं आ तो गया लेकिन मेरे पास कपड़े अधिक नहीं हैं। इन्हीं कम कपड़ों में मुझे पूरा कुंभ का मेला देखनामन में विचार बहुत अधिक हैंपर लिखूं कैसे ???लेखक /कवि तो बनता हूँ मैंलेकिन मेरे पास शब्द नहीं हैंऐसे ही कम शब्दों को लेकर जीवन की उन यात्राओं का अनुभव व्यक्त किया जो मैंने शारीरिक और मानसिक रूप से प्राप्त किया है। यह किताब मेरे कुछ 20-22 सालों का अनुभव ही है जिसको मैंने ग़ज़ल नज़्म या कविता का रूप दिया। आप इसे जो कहना चाहें कह सकते हैं। किस प्रकार एक लड़के का जीवन व्यतीत होता है उस पर प्रकाश डालने का प्रयास किया है। शब्दों में अनुभवहीनता हो सकती है लेकिन मेरे जीवन के अनुभव बहुत पक्के हैं। है।