कलेवर की दृष्टि से छोटा यह उपन्यास प्रभाव की दृष्टि से नाय़क के तीर की तरह अंदर तक झकझोरनेवाला है। आजादी के बाद के भारतीय गाँवों में व्याप्त सामंती-शोषण और मजदूर ग्राम बालाओं के यौन शोषण पर यह तीखा उपन्यास है। लेखक ने ग्रामीण जीवन के यथार्थ से पर्दा हटा दिया है जिससे रू-ब-रू होने के बाद पाठक यह सोचने पर विवश हो जाता है आखिर यह सब क्यों? कब तक?.
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