कुछ चीजें किसी को बहुतों के लिए बेमतलब भी होती हैं। पर इस दीन-दुनिया में निरुद्देश्य जैसा कहीं कुछ नहीं। भले ही इन दिनों बहुतों के लिए सब कुछ ही बेमतलब हो रहा है। इस बेमतलब से ही मतलब निकाल लेने के तौर-तेवर कुछ सोचने-समझने के सरोकार ही कविताई करवाते हैं। कहानी लिऽवाते हैं। बस यह किताब ‘जी उठेंगे मुर्दे भी’ ऐसी ही एक कोशिश है फ्सोये लोगों की क्या है जी उठेंगे मुर्दे भी तू तहे-दिल से कभी उनको सदा दे तो सही।य् उन्हीं बहुसंख्यक मेहनतकश ऽेतिहर शोषित उत्पीड़ितों जूझते लोगों की तरफदारी में आवाज़ उठाने की जो समूचे भारत के प्रदेशों में हैं-------