ऊलुघ ख़ान...! हिंदुओं के इस शिव मंदिर को मस्जिद का जामा पहना दो! जाओ...! उसे जामा मस्जिद बना दो! सुलतान जोरों से गरज उठा। उसकी गर्जना से दरबार की दीवारें तक कांप उठीं! आंखों के क्रोध को मुंह की फुंकार से उगलता हुआ किसी जंगली बिलाब की भांति फनफनाया कल का सूरज निकलने से पहले हमारी हुकूमत में एक भी बुतखाना न रहने पाए! सारे बुतों को तोड़ कर ख़ाक में मिला दो! ....और हमारा तीसरा फरमान गौर से सुनो! बागियों के सरों को काटकर कर दूरों तक उस रास्ते पर बिछा दिया जाय जिस रास्ते से हमारे फ़ौजी सिपाही जिहाद के लिये रवाना होंगे! (इसी उपन्यास से)