कहते हैं शौक बड़ी चीज़ है इसीलिए तो इंजीनियर होते हुए भी अनमोल खत्री साहित्य पढ़ने-लिखने के लिए समय निकाल लेते हैं। अनमोल खत्री का कविता से जुड़ाव बचपन से ही रहा है। स्कूली दिनों में हिंदी की किताबों में कविताओं वाला हिस्सा इन्हें बहुत पसंद था। इसलिए अध्यापक के पढ़ाने से पहले ही ये उन कविताओं को अच्छी तरह पढ़ लिया करते थे। आगे चलकर यह रुचि बढ़ती गई तो अनमोल कविता-साहित्य पढ़ने लगे और फिर धीरे-धीरे लिखने का सिलसिला भी शुरू हो गया। यह सिलसिला अब किताब तक आ पहुँचा है। ‘जितने धागे उतनी गिरहें’ के रूप में अनमोल का यह काव्य संग्रह बेहद संवेदनशीलता के साथ साहित्य में अपनी महती भूमिका निभाने के लिए तैयार है।