सन् 72-74 में जब केंद्र में कांग्रेस की सत्ता थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी थीं तब एक काल-पात्र दफ़नाया गया था।कहा जाता था कि उसमें कांग्रेस का इतिहास दर्ज था।उस समय काल-पात्र को लेकर कांग्रेस और श्रीमती गांधी की ज़बरदस्त आलोचना हुई।कांग्रेस का डाउन फाल हुआ और सत्ता में जनता पार्टी (जेपी) आ गई।काल-पात्र को खुदवा दिया गया। यह काल-पात्र मेरे दिमाग में भूत बनकर बैठा हुआ था।इस पर मैंने लिखना चालू किया तो एक पुस्तक के लायक सामग्री एकत्र हो गई।मेरे काल-पात्र का उस काल-पात्र से सिर्फ इतना सा संबंध है कि वह दफ़नाया गया था और यह भी दफ़न थावह भी खुदवाया गया और यह भी खुदवाया गया।उस काल-पात्र से क्या निकला यह तो पता नहीं किन्तु मेरे काल-पात्र से मुर्दे पात्र बाहर आते हैं।उनका समय और वर्तमान समय में आया फ़र्क विसंगतियांविद्रूपताएं इस पात्र से एक-एक कर बाहर आती हैं। मुर्दे पात्रों के माध्यम से जिंदा हालातों पर चर्चा करने की कोशिश मैंने की है।मैं इसमें कहां तक सफल हुआ हूं यह तो पाठक बताएंगे।दूसरी बात यह है मेरी पुत्री कु.रति शुक्ला ने एक डिजाइन तैयार कर मुझे दी।इसमें दीवाल घड़ी उसके कांटे और उस पर आदमी की छाया बनी हुई थी।इसे देखकर ही मेरे दिमाग का भूत बेचैन हो गया।फलतः काल-पात्र की कड़ियां बनती गईं।वास्तव में इस पुस्तक की क़लम मेरी है पर सारी कल्पना मेरी बेटी की है।पुस्तक के आवरण पृष्ठ का डिजाइन मेरी इसी बेटी ने तैयार किया है। आप इसे अवश्य पढ़ें।यह किताब आपको मनोरंजन के साथ ही बहुत कुछ विषय सामग्री देगी।ऐसी आशा है।जब आप किसी लेखक की पुस्तक लेते हैं तो वह लेखन के क्षेत्र में आपका बड़ा योगदान होता है।अपेक्षा है कि इसे पढ़कर अपनी राय से मुझे अवगत कराएंगे।