‘कब कटेगी चौरासी... ऐसे घावों को हरा करती है जो आज तक नहीं भरे हैं। यह किताब उन सभी लोगों को पढ़नी चाहिए जो चाहते हैं कि ऐसे भयानक अपराध दोबारा न हों।' -खुशवंत सिंहतीन स्याह रातें जिन्होंने इतिहास बदल दिया हज़ारों औरतें जिन्होंने अपना सब कुछ गंवा दिया मासूम बच्चे जिनकी मासूमियत दरिंदगी की भेंट चढ़ गई और प्रशासन न केवल खड़ा मुंह देखता रहा बल्कि उस वहशत का हिस्सा भी बन गया। न तो पीड़ितों को आर्थिक सहायता मिली और न ही न्याय। अदालत की ठोकरें खाते उन्हें पच्चीस साल बीत गए। इन बद से बदतर हालातों ने एक न्यायप्रिय शांत और विनम्र पत्रकार को गृहमंत्री पी चिदंबरम पर भरी सभा में जूता फेंकने पर मजबूर कर दिया। हालांकि वे मानते हैं कि उनके विरोध का तरीक़ा सही नहीं था पर कुछ सवाल हैं जो आज भी उन्हें परेशान करते हैं | अब तक दोषियों को सज़ा क्यों नहीं मिली? क्या प्रशासन तंत्र न्याय होने देगा? कब मिलेगा पीड़ितों को न्याय और कब कटेगी चौरासी? यह किताब 1984 के सिख क़त्लेआम से जुड़ी सचाइयों और सरकार की संवेदनशून्यता का एक सशक्त दस्तावेज़ है। क्योंकि 1984 का दंगा केवल सिखों पर हुआ हमला नहीं था बल्कि यह लोकतंत्र और इंसानियत पर हुआ हमला था।