कब तक रहें कुँवारे ऐसे युवक-युवतियों की कहानी है जिनकी किसी कारणवश यथासमय शादी नहीं हो पाती है। एकाकी जीवन बिताने के लिए बाध्य ऐसे युवक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं इसलिए ब्रह्मचारी कहलाते हैं जब तक कि शादी नहीं हो जाती है। कभी ग्रहों की दशा ऐसी होती है कि वर्ष पर वर्ष बीतते चले जाते हैं लाख हाथ-पैर मारने के बाद भी उनकी शादी नहीं हो पाती है। ऐसे लोगों को हम कठिन ब्रह्मचारी कहते हैं। साधारण ब्रह्मचारी की शादी होने की बहुत संभावनाएँ रहती हैं। कठिन ब्रह्मचारी की एकदम जीरो। फिर भी वह उम्मीद नहीं छोड़ता। क्या पता कभी कोई भूली-भटकी उसका दरवाजा खटखटाए। यदि कभी कोई लड़की उसका दरवाजा न खटखटाए तो वह कठिन ब्रह्मचारी से जटिल ब्रह्मचारी बन जाता है। पात्रों से मिल कर आपको पता लगेगा कि कौन-सा युवक ब्रह्मचर्य की किस श्रेणी में है और कौन-सी युवती विवाहोन्मुख है। रसीले संवाद चुटीले व्यंग्य और शेर-ओ-शायरी से सुसज्जित है यह नाटक कब तक रहें कुँवारे।
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