इधर के वर्षों में जिन युवा गीत-कवियों ने अपनी सुष्ठ-सहज कहन से हिन्दी नवगीत में नये आयाम जोड़े हैं उनमें एक महत्वपूर्ण नाम है कल्पना मनोरमा का। उनके इस संकलन के गीतों का मुख्य स्वर आत्मीय संलाप का है। आत्मा के एहसासों को पूरे मनोयोग से कवयित्री ने इन गीतों में वाणी दी है। किन्तु युग-यथार्थ के भी संकेत इस संग्रह की बहुत सी रचनाओं में पूरी शिद्दत से उपस्थित मिलते हैं। इन गीतों के बीच से गुजरते हुए मुझे इनकी सहज कहन के साथ भाषा के वैविध्य ने विशेष प्रभावित किया है। भाषिक प्रयोगों के माध्यम से एकदम ताजे-टटके और अछूते बिम्बों की संरचना इस संग्रह को विशिष्ट बनाती है। हमारे देशज संस्कारों की विविध बिम्बाकृतियाँ इन गीतों में उपस्थित दिखाई देती हैं। घरेलू प्रसंगों के गीत बड़े चित्ताकर्षक बन पड़े हैं। समग्रतः संकलन की रचनाएँ समकालीन गीत-कविता की एक अलग किसिम की भाषिक भंगिमा की ओर और उन सम्भावनाओं की ओर इशारा करती हैं जिनसे गीत-कविता के नये आयाम परिभाषित होंगे। - कुमार रवीन्द्र