कबीर जैसे संत-भक्त कवियों की वाणी सबसे सशक्त परिष्कारक विकल्प के रूप में दिखाई देती है।कबीर की वाणी समाज के विकृत अंतस्तम को परिष्कृत करने में रामबाण साबित हो सकती है। जाहिर है कि ऐसे परिष्कारक साहित्य को अभिव्यक्ति देने वाला कोई भी सर्जक स्वयं अन्तर्मथित हुए बिना नहीं रह सकता तो फिर कबीर कैसे चुप बैठ सकते थे। दरअसल उनकी वाणी इतना वितान लिए हुए है कि उसमें सभी तरह के भाव भाषा शैली आदि समाहित हो जाते हैं। इन सब के होते हुए भी उनकी वाणी का मूल्यांकन न तो सिर्फ भावों के आधार पर किया जा सकता है और नही सिर्फ भाषिक कला के द्वारा। दोनों का अपना अलग महत्त्व है क्योंकि भाव यदि रचना के प्राण-तत्त्व हैं तो कला भी भावों को साकार करने का आवश्यक उपादान है। यही उपादान भारतीय काव्य में रीति-तत्त्व के नाम से अभिहित है जिसमें रस अलंकार गुण रीति-वृत्ति शब्द-शक्ति वक्रोक्ति आदि समाहित हैं। इन रीति-तत्त्वों में रस यदि कबीर के भाव-संसार को तरल सजल तर रूप प्रदान किया है तो अन्य रीति-तत्त्व उनकी वाणी के सौन्दर्योद्घाटन में सहायक हुए हैं।