Kabir Vani Bhag - 1-7 (???? ???? ???- 1 - 7) | Set of 7 Osho Books In Hindi

About The Book

कहै कबीर दीवाना -: कबीर अपने को खुद कहते हैं : कहै कबीर दीवाना ।एक-एक शब्द को सुनने की समझने की कोशिश करो। क्योंकि कबीर जैसे दीवाने मुश्किल से कभी होते हैं । अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं। और उनकी दीवानगी ऐसी है कि तुम अपना अहोभाग्य समझना अगर उनकी सुराही की शराब से एक बूंद भी तुम्हारे कंठ में उतर जाए। अगर उनका पागलपन तुम्हें थोड़ा सा भी छू ले तो तुम स्वस्थ हो जाओगे। उनका पागलपन थोड़ा सा भी तुम्हें पकड़ ले तुम भी कबीर जैसा नाच उठो और गा उठो तो उससे बड़ा कोई धन्यभाग नहीं है। वही परम सौभाग्य है। सौभाग्यशालियों को ही उपलब्ध होता है।कहै कबीर मैं पूरा पायाकवीर में बड़ा जादू है कि जो तुम्हें है और बड़ा जादू है। कबीर में ऐसा कबीर में ऐसा जादू है कि तुम्हें कवीर बना दे कवीर में ऐसा जानू है कि यहां पहुंचा देउस पर से सब आया है और जही एक दिन लीन हो जाता है। पुस्तक के कुछ मुख्य विषय बिंदु • दुख से मुक्ति कैसे मिले? • मनुष्य का मन क्यों है? • ऊपर कुछ भी नहीं है • प्रेम हा प्रकृति है • जीवन का अर्थ है?गूंगे केरी सरकरा-: जीते-जी मरने का अर्थ है जो मर कर होगा उसे तुम एक घंटा रोज हो जाने दो। कुछ दिन के निरंतर अभ्यास के बाद धीरे-धीरे धीरे धीरे यह अवस्था सधने लगेगी। एक घंटा तुम मुर्दे की भांति पड़े रहोगे। धीरे-धीरे तुम पाओगे श्वास धीमी होती जाती है। जैसे जैसे सधेगी यह कला श्वास धीमी हो जाएगी। क्योंकि जीने वाले के लिए श्वास की जरूरत है; जो मर गया उसके लिए श्वास की क्या जरूरत है? और एक दिन ऐसी घड़ी आएगी कि तुम अचानक पाओगे श्वास बंद है; श्वास चल ही नहीं रही है शरीर बिलकुल मुर्दा पड़ा है। और उसी क्षण तुम्हें पहली दफा बोध होगा अपने पृथक होने का। उसी क्षण-- ''जम ते उलटि भए हैं राम''--उसी क्षण मृत्यु विलीन हो जाती है; राम प्रकट हो जाते हैं; अमृत का अनुभव हो जाता है। फिर तुम तेईस घंटे जीते रहोगे लेकिन रहोगे मुर्दे की भांति। तुम उठोगे काम करोगे सब करोगे; लेकिन तुम जानोगे कि यह शरीर तो मरणधर्मा है मरा हुआ ही हैहोनी होय सो होय-: सीधी अनुभूति है अंगार है राख नहीं। राख को तो तुम सम्हाल कर रख सकते हो। अंगार को सम्हालना हो तो श्रद्धा चाहिए तो ही पी सकोगे यह आग। कबीर आग हैं। और एक घुंट भी पी लो तो तुम्हारे भीतर भी अग्नि भभक उठे- - सोई अग्नि जन्मों-जन्मों की। तुम भी दीये बनो। तुम्हारे भीतर भी सुरज ऊगे। और ऐसा हो तो ही समझना कि कबीर को समझा। ऐसा न हो तो समझना कि कबीर के शब्द पकड़े शब्दों की व्याख्या की शब्दों के अर्थ जाने पर वह सब ऊपर-ऊपर का काम है। जैसे कोई जमीन को इंच दो इंच खोदे और सोचे कि कुआं हो गया। गहरा खोदना होगा। कंकड़-पत्थर आएंगे। कूड़ा-कचरा आएगा। मिट्टी हटानी होगी। धीरे-धीरे जलस्त्रोत के निकट पहुंचोगे।मेरा मुझमें कुछ नहीं-: कबीर ने कहा कि ‘ज्यों कि त्यों धर दीन्हीं चदरिया खूब जतन से ओढ़ी कबीरा।’ तो कबीर कहते हैं कि ओढ़ी तो पर खूब जतन से ओढ़ी। संन्यासी वह है जो ओढ़े ही न। क्योंकि ओढ़ने में डर है कहीं चदरिया खराब न हो जाए। और गृहस्थ वह है जो डट कर ओढ़े चाहे फटे चाहे गंदी हो कुछ भी हो जाए। और कबीर ने ओढ़ी--‘खूब जतन से ओढ़ी रे चदरिया।’ लेकिन जतन से ओढ़ी। यह ‘जतन’ शब्द बड़ा अदभुत है। कृष्णमूर्ति जिसको ‘अवेयरनेस’ कहते हैं वही है जतन। बड़े होश से बड़े प्रयत्न से बड़ी जागरूकता से ओढ़ी। और--‘ज्यो की त्यों धर दीन्हीं चदरिया।’ और जब परमात्मा के पास वापस लौटने लगे तो उसे वैसी ही लौटा दी जैसी उसने दी थी--और ओढ़ी भी। ऐसा भी नहीं कि बिना ओढ़े नंगे बैठे रहे। कबीर यह कह रहे हैं कि गृहस्थ भी रहे और संन्यस्त भी रहे। रहे संसार में और अछूते रहे--कमलवत।-ओशोपुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदुःनीति और धर्म में क्या भेद है?परमात्मा है क्या?सुख से वैराग्य का जनम होता है। क्यों?असहाय अवस्था का अर्थ क्या है?ऊंट किस करवट बैठे--विधायक या निषेधात्मक?ज्ञानी का मार्ग भक्त के मार्ग से क्या सर्वथा भिन्न है?कस्तूरी कुंडल बसै-: कबीर ने बड़ा प्यारा प्रतीक चुना है । जिस मंदिर की तुम तलाश कर रहे हो वह तुम्हारे कुंडल में बसा है; वह तुम्हारे ही भीतर है; वह तुम ही हो । और जिस परमात्मा की तुम मूर्ति गढ़ रहे हो उसकी मूर्ति गढ़ने की कोई जरूरत ही नहीं; तुम ही उसकी मूर्ति हो । तुम्हारे अंतर-आकाश में जलता हुआ उसका दीया तुम्हारे भीतर उसकी ज्योतिर्मयी छवि मौजूद है। तुम मिट्टी के दीये भला हो ऊपर से भीतर तो चिन्मय की ज्योति है । मृण्यम होगी तुम्हारी देह; चिन्मय है तुम्हारा स्वरूप। मिट्टी के दीये तुम बाहर से हो; ज्योति थोड़े ही मिट्टी की है। दीया पृथ्वी का है; ज्योति आकाश की है। दीया संसार का है; ज्योति परमात्मा की है।सुनो भई साधो-: कबीर अनूठे हैं और प्रत्येक के लिए उनके द्वारा आशा का द्वार खुलता है। क्योंकि कबीर से ज्यादा साधारण आदमी खोजना कठिन है। और अगर कबीर पहुंच सकते हैं तो सभी पहुंच सकते हैं। कबीर निपट गंवार हैं इसलिए गंवार के लिए भी आशा है बे-पढ़े-लिखे हैं इसलिए पढ़े-लिखे होने से सत्य का कोई भी संबंध नहीं है। जाति-पांति का कुछ ठिकाना नहीं कबीर की-शायद मुसलमान के घर पैदा हुए हिंदू के घर बड़े हुए। इसलिए जाति-पांति से परमात्मा का कुछ लेना-देना नहीं है। कबीर जीवन भीर गृहस्थ रहे-जुलाहे-बुनते रहे कपड़े और बेचते रहे घर छोड़ हिमालय नहीं गए। इसलिए घर पर भी परमात्मा आ सकता है हिमालय जाना आवश्यक नहीं। कबीर ने कुछ भी न छोड़ा और सभी कुछ पा लिया। इसलिए छोड़ना पाने की शर्त नहीं हो सकती। और कबीर के जीवन में काई भी विशिष्टता नहीं है। इसलिए विशिष्टता अहंकार का आभूषण होगी आत्मा का सौंदर्य नहीं। कबीर न धनी हैं न ज्ञानी हैं न समादृत हैं न शिक्षित हैं न सुसंस्कृत हैं। कबीर जैसा व्यक्ति अगर परमज्ञान को उपलब्ध हो गया तो तुम्हें भी निराश होने की कोई भी जरूरत नहीं। इसलिए कबीर में बड़ी आशा है।-ओशोपुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदुःमुमुक्षा का क्या अर्थ है?हृदय में विवेक का क्या अर्थ होता है।प्रेम के कितने रूपधर्म और संप्रदाय में भेदमृत्यु के रहस्य
Piracy-free
Piracy-free
Assured Quality
Assured Quality
Secure Transactions
Secure Transactions
Delivery Options
Please enter pincode to check delivery time.
*COD & Shipping Charges may apply on certain items.
Review final details at checkout.
downArrow

Details


LOOKING TO PLACE A BULK ORDER?CLICK HERE