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नर्मदा जानती है मन का हर ताप समझती है इसके भीतर उठती तरंगों को इसलिए जब ख़ुद से मिलना हो तो नदी से मिलना चाहिए नर्मदा सिर्फ़ शिव का अभिषेक नहीं करती ये करती है अभिषेक मन का भी कि धुल जाए हर संताप - हर पीड़ा बढ़ती सूरज की किरणों के साथ बढ़ता है इसका वेग मानों दिखा रहा हो आईना कि चमकना सदा का नहीं शास्वत कुछ भी नहीं बहना गति में रहना यही सत्य है यही अमिट