जीवन में अलग-अलग समय पर अवसर आते गए और ये सभी अलग-अलग साक्षात्कार होते चले गए जो इस पुस्तक ‘कागज पर लिखी बातचीत’ में समाहित हुए हैं। वैसे हमेशा से मेरी आदत रही है कि रचना-संसार की शख्सियतों से मिलता हूँ तो लंबी और सहज बातें करने बैठ जाता हूँ। समकालीन-कविता के घटनाक्रमों पर बात करने की दिलचस्पी रही है। ऐसे भी हुआ है जैसे जसवीर त्यागी और शरद कोकास के साथ रहने के बनारस और जयपुर में अवसर मिले थे और हमने रातभर ऐसी सिलसिलेवार बातें की कि होश जब आया तब देखा कि सुबह हो गई है। वे रातों से लंबी बातें थीं। समर्थ आलोचक शंभू गुप्त के साथ भी घंटों चाय-पर-चाय पीते हुए जयपुर बस आँखें पर बातें होती चली गई थी।