हास्य एवं व्यंग्य सामाजिक नियंत्रण का ऐसा प्रभावशाली साधन है जिसका कि आदि काल से महत्वपूर्ण स्थान रहा है। चाहे हम सामन्तवादी समाजों का अवलोकन करें अथवा आज के प्रगतिशील समाजों का। जब व्यक्ति सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों की अवहेलना करने लगता है एवं अनजाने में अथवा भ्रमवश अपने व्यवहार को समाज विरोधी बना लेता है। कभी बाप-दादाओं परम्पराओं अन्धविश्वासों रूढ़ियों और पुराण पंथ के नाम पर वह सांस्कृतिक मूल्यों की अवहेलना करते हुये अपने व्यवहार को समाज विरोधी बना लेता है तो इसके व्यवहार पर हास्य व्यंग्य के द्वारा ही नियंत्रण किया जा सकता है। हास्य व्यंग्य का उद्देश्य सदैव व्यक्ति को सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप व्यवहार करने को बाध्य करना होता है। प्रस्तुत पुस्तक में हास्य व्यंग्य विधा से सामाजिक मूल्यों की पुनःस्थापना सम्बधी प्रयास किया गया है। जीवन धारा को निर्धारित करने में हास्य व्यंग्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है परन्तु दुर्भाग्य वश साधारण बुद्धि वाला व्यक्ति इस विधा को पचा नहीं पता इसलिए वह इस विधा को मात्र आलोचना समझ बैठता है।