यह किताब एक विद्यार्थी के पत्रकार बनने की कहानी है। लेकिन साथ ही पत्रकारिता के भ्रमलोक से पर्दा भी उठाती है। निराशा में आशा को तलाशने और कर्तव्य पथ पर डटे रहने की सीख भी देती है। कर्म और जुगाड़ के बीच द्वंद्व चलता रहता है लेकिन अंत में जीत कर्म की होती है।