Kala Samaj Aur Muktipath

About The Book

इस पुस्तक में सत्य और मिथ के बीच झूलते बस्तर के रहस्यमयी अबूझमाड़ और बस्तर की माओवादी समस्या को बूझने के साथ-साथ कला के माध्यम से यहाँ के समाज को देखने का प्रयास किया गया है । माओवाद जैसा अभिशाप बस्तर ही नहीं पूरे भारत के लिये संक्रामक रोग की तरह फैलता रहा है जिससे बस्तर सहित कई वनवासी क्षेत्रों का विकास प्रभावित हुआ है । लोगों को लगने लगा है कि बस्तर में कई दशकों से हो रही क्रूर हत्याओं और उत्पीड़न पर अब तो एक पूर्णविराम लगना ही चाहिये । उग्रवाद से पीड़ित एवं प्रभावित लोगों को समाज की मुख्यधारा में लाना एक बड़ी चुनौती है जिसके प्रति इस पुस्तक के मुख्यपात्र पद्मश्री डॉक्टर अजय कुमार मंडावी की संवेदनशीलता को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है । प्रसंगवश इस पुस्तक में कानू सान्याल और उनके नक्सलबाड़ी आंदोलन का भी उल्लेख किया गया है जिससे बस्तर में फैले माओवाद की जड़ों को समझने में कुछ सरलता हो सकती है । इस सबके बाद भी यह पुस्तक न तो राजनीतिक है और न प्रतिक्रियात्मक बल्कि सामाजिक सम्बंधों के बिखरे और टूटे हुये ताने-बाने के साथ कुछ खोजने और कुछ जोड़ने के अभियान का एक भाग है ।
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