हवा (बयार) मानव-जीवन के अभिन्न स्रोतों में से एक ऐसा स्रोत है जिसके बिना जीवन की कल्पना भी असंभव है। अदृश्य होते हुए भी हवा प्रकृति एवं मौसम के अनुरूप अपनी गति व रूप परिवर्तित करती रहती है। उसी प्रकार मानव-हृदय भी समय एवं परिस्थितियों के अनुरूप अनेक भावनाओं से परिपूर्ण रहता है। लेखनी के माध्यम से कवि-हृदय इन भावों को कागज पर उकेर कर साहित्य-प्रेमी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर उन्हें वर्तमान की विभिन्न सामाजिक व प्राकृतिक परिस्थितियों से न केवल जोड़ता है अपितु अपने हृदय के भावों से उन्हें अवगत भी कराता है।मेरा द्वितीय काव्य-संग्रह कंचनी बयार (२) भी अपनी रचनाओं के माध्यम से साहित्य-प्रेमियों को ऐसी कुछ परिस्थितियों से रूबरू कराते हुए उनके मन-मस्तिष्क में अपने लिए स्थान बना उनका अमूल्य स्नेह प्राप्त करने का प्रयास मात्र है।