प्रेम उनकी कविताओं के केंद्र में है लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि निवेदिता की प्रेम कविताएं एक एक्टिविस्ट की कविताएं हैं। इसीलिए उनमें जीवन और विचार के संघर्ष के साथ-साथ समाज की विसंगतियाँ और समय की विडंबनाएँ भी अंतर्निहित हैं। यही वह विशेषता है जो उन्हें औरों से अलग करती है और सहज अभिव्यक्ति को दुर्लभ कलात्मकता प्रदान करती है। निवेदिता के इस तीसरे संग्रह की कविताओं में भी प्रेम के विभिन्न रूपों के विस्तार को देखा जा सकता है। केवल ''निहारना'' जैसी कविता में ही नहीं दुख को केंद्र में रखकर लिखी कविताओं में भी अंतःसलिला के रूप में उसकी उपस्थिति को महसूस किया जा सकता है। इस संग्रह में कुछ राजनीतिक कविताएं भी हैं जो हमारे समय के अंधेरे और सत्तापक्ष की क्रूरताओं को व्यक्त करती हैं। निवेदिता शमशेर और फ़ैज़ की परंपरा की कवि हैं जिनके लेखन में ही नहीं जीवन में भी प्रेम और क्रांति को एक साथ लक्षित किया जा सकता है। वह प्रेम को हिंस्र समय के विरुद्ध सबसे विश्वसनीय प्रतिरोध के रूप में रचती हैं तो दूसरी तरफ राजनीतिक प्रतिरोध को रूमानियत की गहराई के साथ व्यक्त करती हैं। इस तरह कविता की एक दुर्लभ परंपरा को आगे ले जाती हैं। स्त्री कविता का यह बिल्कुल ही नया तेवर है जिसमें स्त्रीअस्मिता के भीतर स्त्रीचेतना भी अनुस्यूत है तभी तो वे ''मुखोटे'' और ''अंधेरे समय की कविता'' जैसी कविताएं लिख पाती हैं। निवेदिता जितनी संवेदनशील हैं अपनी कविताओं में उतनी ही सजग भी। वे विचारधारा और सृजनात्मकता के अंतर्संबंधों को अपनी तरह से परिभाषित करती हैं। उनकी कविताएं चमत्कृत नहीं करती गहरी प्रेरणा देती है। : मदन कश्यप