पद्मश्री पंडित राजेश्वर आचार्य काशी की धरोहर हैं । जिन्होंने काशी में नहीं जिया बल्कि काशी को जिया है। इनका बहुआयामी व्यक्तित्व काशी के सौ साल से अधिक के इतिहास को समेटे हुए है। यह किताब काशी के सांगीतिकसाहित्यिकसांस्कृतिकऔर राजनैतिक इतिहास के सौ साल से अधिक के सफ़र का एक दस्तावेज़ है। काशी का पूरा सांगीतिक और सांस्कृतिक माहौलकाशी की परंपरा काशी के विश्व प्रसिद्ध ध्रुपद मेले की बहुत सी सुनी और अनसुनी बातें पाठक को आश्चर्यचकित करेंगी। पंडित राजेश्वर आचार्य संगीत परंपरा में संगीत मार्तंड पंडित ओंकारनाथ ठाकुर और पंडित बलवंत राय भट्ट के शिष्य हैं। प्रो. राजेश्वर आचार्य जी मूर्धन्य कलाकार और विद्वान हैं। वह एक अच्छे संगीतकारसाहित्यकारमूर्तिकारचित्रकारचिंतक हैं। आचार्य जी का जलतरंग वादन में भारत के उत्कृष्ट कलाकरों में एक नाम है। उन्होंने जलतरंग वादन को एक नया अंदाज़ दिया। उन्होंने भारत में सबसे पहले सांस्कृतिक पत्रकारिता की शुरुआत की । पंडित राजेश्वर आचार्य काशी में प्रत्येक वर्ष होने वाले विश्व विख्यात ध्रुपद मेले के संस्थापक सदस्य हैं। यह ध्रुपद मेला काशी में पचास वर्षों से लगातार होता आ रहा है। आचार्य जी कोई आम संगीतकार नहीं हैं बल्कि उन्होंने संगीत को विज्ञान की दृष्टि से देखा। नेशनल और इंटरनेशनल साइंस कॉन्फ्रेंसे में अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया। जिसको देखते हुए आपको इंडियन बायो फिजिक्स सोसाइटी का आजीवन सदस्य बनाया गया। पंडित राजेश्वर आचार्य जी ने काशी में 1972 में साढ़े बारह घंटे अनवरत जलतरंग वादन और 1974 में तेरह घंटे अनवरत शास्त्रीय गायन का विश्वकीर्तिमान बनाया है। इनकी कृतित्व को देखते हुए भारत सरकार ने आपको 2019 में पद्मश्री अवार्ड से नवाज़ा है। यह पुस्तक 70 अध्यायों पर आधारित है। मैंने सदैव यह कोशिश की है कि काशी जैसी सांस्कृतिक नगरी की सुनी और अनसुनी बातों को शहर के इन वयोवृद्ध लोगों से लेकर उसको धरोहर के रूप में संजो दें ताकि आने वाली पीढ़ी इससे फायदा उठा सके। : डॉ. शबनम खातून