11 अध्यायों में लिखी यह पुस्तक कश्मीर की परंपरा सभ्यता कला संस्कृति को समझने का एक प्रयास है। प्राचीन अभिलेखों से पता चलता है कि प्राचीन मंदिर मात्र मूर्तियों से ही नहीं भरे थे वे विज्ञान चिंतन वास्तुकला ज्ञान चित्रकला के केन्द्र थे। संगीत और साहित्य के भी केन्द्र थे। किंतु ये सब नष्ट किये गए। अपनी पुस्तक ''वाक्यात-ए-कश्मीर'' में फ़ारसी इतिहासकार मुहम्मद आज़म ददमिरी कश्मीर के मार्तण्ड मंदिर के विषय में लिखते हैं:- सुल्तान सिकंदर बुतशिकन के समय में यह मंदिर तोड़ा गया। इसे लकड़ियों से लपेटा गया और जला दिया गया। यह बहुत समय तक जलता रहा। यहाँ के निवासी ब्राह्मणों को यहाँ से बाहर खदेड़ा गया था। इसके अवशेष आज भी बीचोबीच बिखरे पड़े हैं। इसके आसपास के महल ध्वस्त किये गए हैं तथा यह अब उस प्राचीनकाल की भव्यता का अवशेष मात्र है। कश्मीर की भव्यता की ध्वंस कथा ''बहेरिस्ताने शाही तथा तोहफतुल अहबाब'' में विस्तार से दर्ज है जो कि फारसी इतिहासकार मुहम्मद अली कश्मीरी ने लिखी है। कश्मीरी पण्डितों को ही इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर बहुत-सी पाण्डुलिपियों की रक्षा की। यूरोपीय विद्वानों ने उन्हें कश्मीरी पण्डितों से प्राप्त किया और संग्रहालयों तथा विश्वविद्यालयों में इन्हें सुरक्षित रखने का प्रयास किया। प्राचीन भूमिशोभा (व्यूग) तथा गृह शोभा (क्रूल खारुन) आज इस निर्वासन में भी कश्मीरी पण्डितों ने बचा रखा है तथा इसका अनुपालन किया जा रहा है। यह एक भिन्न विषय है जिसे मैंने अपनी दूसरी पुस्तक कश्मीर कला और चित्रकला में चर्चा में समाहित किया है। नयनसुख के चित्र हमें गर्व से भरते हैं। इनके चित्र विश्व भर में संग्रहालयों और विश्वविद्यालयों में हैं तथा ''विश्व धरोहर'' हैं।