'कस्तूरी कुंडल बसै।'<br>कबीर ने बड़ा प्यारा प्रतीक चुना है। जिस मंदिर की तुम तलाश कर रहे हो वह तुम्हारे कुंडल में बसा है; वह तुम्हारे ही भीतर है; वह तुम ही हो। और जिस परमात्मा की तुम मूर्ति गढ़ रहे हो उसकी मूर्ति गढ़ने की कोई जरूरत ही नहीं तुम ही उसकी मूर्ति हो। तुम्हारे अंतर-आकाश में जलता हुआ उसका दीया तुम्हारे भीतर उसकी ज्योतिर्मयी छवि मौजूद है। तुम मिट्टी के दीये भला हो ऊपर से भीतर तो चिन्मय की ज्योति है। मृण्यम होगी तुम्हारी देह; चिन्मय है तुम्हारा स्वरूप। मिट्टी के दीये तुम बाहर से हो; ज्योति थोड़े ही मिट्टी की है। दीया पृथ्वी का है; ज्योति आकाश की है। दीया संसार का है; ज्योति परमात्मा की है।