मेरी कविताएं मात्र मेरा विचार मेरे अंदर से निकले हुए उद्गार हैं। न ही मैं इनसे कोई क्रांति लाने का दावा कर रहा न ही इनसे कोई सामाजिक बदलाव लाने की बात कर रहा। ये कविताएं तो बस मैंने उठते-बैठते लोगों से बोलते बतियाते यात्रएं करते जो भी मन में विचार आ जाते उन्हें कलमबद्ध करता गया। कभी-कभी कुछ कविताएं कुछ पत्र-पत्रिकाओं में भेजीं और वो प्रकाशित होती गईं। इनमें कुछ छोटी-छोटी कविताएं ऐसी भी हैं जिन्हें मैंने बस ट्रेन में यात्र करते मोबाईल में भी लिखा। कुछ ऐसी हैं जिन्हें मैंने किसी सरकारी प्राथमिक विद्यालय में शूटिंग के दौरान ब्रेक टाइम में स्कूल के बच्चों से कागज उधार मांग कर लिख डाला। तो इसी तरह फुटकर रूप में लिखते-लिखते पिछले सोलह वर्षों में मेरे पास इतनी कविताएं इकट्ठी हो गईं कि मैं इन्हें एक संकलन के रूप में सामने ला सकूं। - हेमंत कुमार