हम जिस विशवास और आस्था के साथ विश्व चराचर में मानव जाति को निखरता हुआ देखना चाहेंगे और उसी आस्था विशवास के साथ हम एक उन्नत मानसिकता के साथ समाज में अपनी भूमिका को भी स्पष्ट करना चाहेंगे। भाष्य कथा काहिनी व्याख्यान आदि का एक अभिप्राय यह भी हो सकता होगा कि इसके जरिये भक्त के भक्ति भाव का पोषण संवर्धन और परिमार्जन हो; ज्ञान चक्षु के जरिये उन्हें विश्व चराचर जगत में निविष्ट ईष्ट का अनुसंधान करने का अवसर मिले; पूर्णता पाने के मार्ग में चल पड़ने लायक आत्मबल उन सबको मिले। अध्यात्मप्रसाद लाभ हो चुका है ऐसा पुरुष न शोक करता है और न आकाङ्क्षा ही करता है; उनके मन में अप्राप्त विषय के लिए आकांक्षा रह ही नहीं सकती; उन्हें न तो किसी से कुछ पाने की अभिलाषा ही रहती।